Wednesday, December 24, 2025

दीवार की वह खिड़की

विनोद कुमार शुक्ल का तीसरा उपन्यास दीवार में एक खिड़की रहती थी सहजता, सरलता और पवित्रतापूर्ण जीवन का एक अंश है- एक मंगल कलश। यह भाषा-विन्यास और भंगिमा में एक अनुगुंजित आलाप है। जीवन के भावलोक की तरंगित भाषा; एक वर्तुल-सा बनाती सुनाई-दिखाई देती। जीवन एकदम तरल-सा एक पत्ते. से दूसरे पर तैरता - एक 'टप्प' भी नहीं। प्रकृति अपने रूपों, रंगों, आकारों में बोलती-सुनती, लोक उस का एक अनुषंगी भाव।

'देहरी' की दुनिया उपन्यास में लगभग अनुपस्थित है। देहरी के उस पार ही कंकर-पत्थर, गारा-मिट्टी, झाड़-झंखाड़ और पीड़ा ले कर एक दुनियावी नदी बहती है। विनोद कुमार शुक्ल के इस शीर्षक दीवार में एक खिड़की रहती थी का यह 'थी' बहुत ही अर्थपूर्ण संभावनाओं की ओर इशारा करता है। इस में एक 'विजन' निहित है।

विनोद कुमार शुक्ल के पहले, दूसरे और अब इस तीसरे उपन्यास का केन्द्र 'घर' है। पहले उपन्यास नौकर की कमीज की शुरुआती पंक्तियाँ हैं, "यदि मैं किसी काम से बाहर जाऊँ, जैसे पान खाने तो यह घर से बाहर निकलना नहीं था, क्योंकि मुझे वापस लौट कर आना था।... लौटने के लिए खुद का घर जरूरी होता है, चाहे किराए का एक कमरा हो या एक कमरे में कई किराएदार हों।" दूसरे उपन्यास खिलेगा तो देखेंगे में "गाँव में केवल दो पक्के मकान थे-एक ग्रामसेवक का क्वार्टर और दूसरा पुलिस थाना। झोपड़ियों की तुलना में दोनों भव्य लगते।" इन पंक्तियों से उपन्यास शुरू होता है। पहले उपन्यास का 'घर' दूसरे में 'मकान' और 'क्वार्टर' में तब्दील हो गया है।

इस तीसरे उपन्यास की शुरुआती पंक्तियों में 'घर' या घर का कोई चित्र भी नहीं है, जबकि इस के शीर्षक 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' में घर का स्वाद छुपा हुआ है। उपन्यास के पूर्व चौदह पंक्तियों की एक कविता है। गोया उपन्यास में पहले एक कविता रहती थी।

अनगिन से निकल कर एक तारा था।

एक तारा अनगिन से बाहर कैसे निकला था?...

अनगिन अकेले अनगिन ।

अनगिन से अकेली एक

संगिनी जीवन भर।

पूर्व की यह कविता उपन्यास के अंत में खुलती है। इस कविता के बाद हम उपन्यास के जीवन में प्रवेश पाते

हैं इन पंक्तियों के साथ:
हाथी आगे-आगे निकलता जाता था और पीछे-पीछे हाथी की खाली जगह छूटती जाती थी।
"आज की सुबह थी। सूर्योदय पूर्व की दिशा में था। दिशा वही रही आई थी, बदली नहीं थी। ऐसा नहीं था कि सूर्य धोखे से निकलता था, उस के निकलने पर सब को विश्वास था। किसी दिन सूर्य बादलों में छुपा हुआ निकला होता पर निकला हुआ जरूर होता था।" विनोद कुमार शुक्ल सूर्य अर्थात् प्रकृति की हमारे जीवन में अनिवार्यता की ओर इशारा करते हैं। प्रथम पृष्ठ की लगभग पच्चीस पंक्तियों में 'घर' नहीं है। 'खिड़की' है और यहीं घर है। यहीं से विनोद कुमार शुक्ल के शिल्प और कथ्य स्तर पर दूसरे सभी उपन्यासों से बुनियादी अंतर की शुरुआत होती है।

इस उपन्यास को पढ़ने के पूर्व विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ने का अनुभव हो तो अच्छा है। विनोद कुमार शुक्ल अपनी कथन पद्धति का इस उपन्यास में जितना सतत आविष्कार करते चलते हैं, वह दुर्लभ है।

कुल जमा कथा इतनी है कि गाँव के गरीब माता-पिता का बड़ा बेटा रघुवर प्रसाद पास के एक क़स्बे में, एक निजी महाविद्यालय में गणित का व्याख्याता है। वह नवविवाहित है। उस की पत्नी सोनसी कस्बे में साथ रहती है। गाँव में रघुवर प्रसाद के माता-पिता और छोटा भाई-छोटू रहते हैं। वे लोग कभी-कभी गाँव से रघुवर प्रसाद के पास क़स्बे में आते हैं। रघुवर प्रसाद को आठ सौ रुपया मासिक वेतन मिलता है। इसी वेतन से सभी की गुजर-बसर की कोशिश है। उन के जीवन का प्रकृति से अद्भुत तरीके से सामंजस्य है। साधू और उस का हाथी, चाय वाली बूढ़ी अम्मा, पेड़ पर छुप कर रहने वाला लड़‌का, विभागाध्यक्ष आदि इस कथा को दुनियावी बनाते हैं।

रघुवर प्रसाद का विवाह हुए बारह दिन हुए हैं, और हम उपन्यास के जीवन में प्रवेश करते हैं। रघुवर की कथा से महत्त्वपूर्ण हैं रघुवीर प्रसाद की निजी, पारिवारिक और सामाजिक स्थितियों के ब्योरे। ये ब्योरे सुचनात्मक और सतही लगते हैं। हल्के-फुल्के भी। पर ये हैं गंभीर टिप्पणियाँ। खुद लेखक न बोल कर स्थितियां बोलती हैं।

महाविद्यालय से लगी हुई झौंपड़ी में प्राथमिक शाला थी। इस स्कूल के शिक्षक महाविद्यालय शिक्षक का बहुत आदर करते थे। गाँव वालों का कहना था कि महाविद्यालय के इतने कमरे खाली है, उसी में प्राथमिक स्कूल लग सकता है। प्राचार्य और कमेटी के लोगों को एतराज नहीं था। परंतु एक दिक्कृत थी "स्कूल के बच्चों का हल्ला बहुत होता था। स्कूल के शिक्षकों का कहना था कि वे बिना हल्ला किए पढ़ाएँगे और पढ़ाते समय खिड़की-दरवाजे बंद कर लेंगे।" स्कूल के बच्चों को यह स्थिति मालूम पड़ने पर छोटे बच्चों ने हल्ला-गुल्ला करना, चिल्लाना करीब-करीब बंद कर दिया था। आपस में झगड़ा करते तो चुपचाप। बच्चे आपस में फुसफुसाकर बात करते थे। बच्चे मुँह में उँगली रखे आते-जाते दिखते थे।" (पृ. 23) स्कूल के नन्हें बच्चे मुँह पर उँगली रखे अपना बचपन खो रहे थे। महाविद्यालय के शिक्षकों ने इस मार्मिक घटनाक्रम पर कभी कोई चर्चा नहीं की। लेखक ने इस स्थिति को अनकहा ही रहने दिया। यह अनकहा ही शायद एक अनकही टिप्पणी-सा पाठक के साथ रह जाता है।

विनोद कुमार शुक्ल ने कस्बाई उच्च शिक्षा के केन्द्र के शिक्षकों की सोच और चिन्ता का खुलासा उन के लंबे-लंबे विचार-विमर्शों के माध्यम से किया है। कस्बाई शिक्षित वर्ग का यह चित्रण वैसे अब किसी भी महाविद्यालय के जीवन का अंश बन चुका है। लेखक की ओर से अपनी कोई टिप्पणी नहीं है। इस उपन्यास की यह एक विशेषता है कि खुद लेखक इस में उपस्थित नहीं है। बात बोलेगी हम नहीं। रघुवर प्रसाद और विभागाध्यक्ष का संवाद अंश:

"फिर भी आप क्या सोचते हैं?"

"हाथी बैलगाड़ी से आगे निकल जाएगा।"

"मुझे भी यही लगता है और साइकिल ?"

"साइकिल हाथी से आगे निकल जाएगी।"

"यदि हाथी पैदल चले तो!"

"हाथी पैदल चले क्या मतलब!"

"यदि न चले तो घोड़े पर चलेगा?"

"नहीं सर, मैं कह रहा था, हाथी दौड़ेगा तो साइकिल आगे न निकल पाए।"

"हाँ, आखिर हाथी दौड़ेगा तो पैदल ही। भैंस को भागते हुए देखे हो। तेज़ दौड़ती है।" (पृ. 18-19)

यह वार्तालाप यूँ ही आगे बढ़ता है और इस में कुत्ता, ऊँट, राजा, किसान आदि चर्चा के विषय बनते हैं। एक और दृष्टांत जरूरी है:

"सर काँजी हाउस में भालू को रख सकते हैं?" विभागाध्यक्ष को शक हुआ कि रघुवर प्रसाद को काले जानवरों से अधिक लगाव है। जैसे- हाथी, भालू, भैस इत्यादि...

"अपनी बस्ती में भालू नचाने वाला एक भी आदमी नहीं है। अगर होगा तो वह भालू के साथ रहता होगा।"

"भालू पालतू जानवर नहीं है। जंगली जानवर है। पालतू जानवर की नीलामी करेंगे। जंगली जानवर को जंगल भेज देंगे, समझे।"

"समझ गया। पर सर। गाय एक समय पालतू नहीं रहीं होगी। वह भी जंगली जानवर होगी। मनुष्य जंगली था। भालू भी धीरे-धीरे पालतू हो जाता!" (पृ. 20-21)

"जी सर! पिताजी कहते हैं जब पानी गिरता है तो चोरों को चोरी करने में आसानी होती है।"

"हाँ, मैं कुत्ते के बदले एक शेर पालने की बात सोच रहा हूँ। जब चोर आएगा तो वह भौकेगा नहीं, दहाड़ेगा।"

(पृ. 22)

इस बातचीत में 'समझे', 'समझ गया', 'जी सर' बातचीत को गंभीर टिप्पणी में बदलते हैं। स्कूली बच्चे 'मुँह पर उंगली' रख कर महाविद्यालय के आँगन में पढ़ रहे हैं। दूसरी ओर महाविद्यालय के शिक्षक इस तरह के वार्तालाप में अक्सर व्यस्त रहते हैं। कभी साइकिल; कभी गाय और हाथी पर ऐसे ही संवाद भरे पड़े हैं। इस बातचीत से उच्च शिक्षित वर्ग के वैचारिक धरातल की परते उघड़ती हैं। इन के वार्तालाप में देश, समाचारपत्र, समाचार, रेडियो, पुस्तक और लाइब्रेरी का कहीं एक शब्द नहीं। कमोवेश ऐसी स्थिति पूरे देश की है। भैंस, भालू के समतुल्य कई लोगों पर बाँझ चर्चा भी तो सच है।

हम उपन्यास में समय के किस कालखंड से हो कर गुज़र रहे है, इस का अनुमान हमें यहाँ-वहाँ पड़ी सूक्ष्म सूचनाओं से करना होता है। रघुवर प्रसाद को आठ सौ रुपया और विभागाध्यक्ष को पंद्रह सौ रुपया महीना वेतन मिलता था। इस हिसाब से यह सत्तर के दशक में दिए गए यू.जी.सी. वेतनमान का समय है। यह लगभग एक दशक से अधिक अवधि तक लागू रहा। उस समय के वेतनमानों की तुलना में यह सर्वश्रेष्ठ वेतनमानों में से था। इस लिहाज़ से रघुवर प्रसाद की गरीबी विसंगतिपूर्ण-सी लगती है। विभागाध्यक्ष पंद्रह सौ रुपयों में बड़े परिवार, अच्छे आवास और स्कूटर के रख-रखाव के साथ सुखी हैं। शायद विनोद कुमार शुक्ल महाविद्यालय परिवेश को सहज रूप से उठा लेते हैं। उन की कुछ कहानियों और एक उपन्यास में भी तालाब से घिरे महाविद्यालय है।

रघुवर प्रसाद की दुनिया में अनेक छोटी-छोटी वस्तुओं का अभाव है। अच्छा घर नहीं, घर का सामान और साइकिल तक नहीं। घर में एक चारपाई और एक कप-बसी थी। कुछ वस्तुएँ थीं जो प्राप्त हुई थीं। रघुवर प्रसा की बड़ी बहन इसी शहर में थी। जीजाजी ट्रांसपोर्ट ऑफिस में क्लर्क थे। "बड़ी बहन ने शक्कर, चाय, पत्ती, जीरा, राई इत्यादि चौके की चीजों के लिए टिन के और प्लास्टिक के पुराने डिब्बा-डिब्बी दिए थे। आटा रखने के लिए टिन का सुंदर नया डिब्बा था। यह अस्पताल के पलस्तर का खाली डिब्बा था।" (पृ. 24-25)

रघुवर प्रसाद का घर एक कमरे का था। तीस रुपए महीना कमरे का देते थे। आजू-बाजू एक-एक कमरे और थे। टट्टी मकान से कुछ दूर हट कर बनी थी। "तीन कमरे के परिवार के लिए तीन टट्टियाँ लाइन से बनी थीं। शादी के बाद रघुवर प्रसाद आठ रुपए महीने के हिसाब से एक टट्टी में ताला लगाने लगे थे। टट्टी का ताला एकदम नया खरीदा था। टट्टी का किराया कम होना था। घर-गृहस्थी के टट्टी के इंतजाम में वे ठगा गए थे। (पृ. 25)

रघुवर प्रसाद के 'रारीब-लोक' की रचना अतिशय यथार्थ होते हुए भी यथार्थ का अतिक्रमण लगती है। रघुवर प्रसाद के माता-पिता और छोटा भाई छोटू गाँव से अक्सर उन के पास आते रहते हैं। पिता गाँव में किसान हैं या मजदूर, पता नहीं लगता, पर वे हैं एक सीमांत ग्रामीण। पिताजी की आर्थिक स्थिति का आभास उन के इस कथन से हो जाता है, "टट्टी का ताला तुम निकाल कर रख लेना। एक ताला मैं ले जाऊँगा। पैरा कोठा में लगाऊँगा, पैरा चोरी चला जाता है। बड़ी मुश्किल से एक गाय का चारा जुट पाता है।" (पृ. 29) पिता अपने पुत्र से अपने पितृत्व

की गरिमा बचाते रहते हैं।

"कमजोरी है डॉक्टर को दिखा देते।"

"होम्योपैथी वाले को?" (पृ. 32)

यहाँ होम्योपैथी वाले प्रसंग में पैसों की कमी की टीस प्रकट हो रही है। रघुवर प्रसाद पिताजी से कभी कुछ नहीं कहते, बस कभी बात करने से बचते। 'पिताजी से तबियत के बारे में पूछेंगे तो अपनी सब बीमारियाँ बतलाने लगेंगे। तब रघुवर प्रसाद को घबराहट होने लगती थी।" (पृ. 30) फिर भी रघुवर प्रसाद का माता-पिता के प्रति आदर-स्नेह असंदिग्ध है। रघुवर और सोनसी को माता-पिता और छोटू के प्रति आदर और स्नेह से भरा हो पाते हैं। आर्थिक कठिनाइयों के मध्य सास और बहू के संबंध माँ और पुत्री के संबंधों से भी अधिक आत्मीय हैं। इस उपभोक्तावादी समय में रघुवर प्रसाद के परिवार के मिठास-भरे व्यवहार के लिए हर व्यक्ति भूखा है। इस परिवार के क्षण उपन्यास के सबसे सशक्त क्षणों में हैं। इन के समक्ष समस्त प्रकार की भौतिक सुख-सुविधाएँ मामूली लगती हैं। आखिर इस परिवार को इतना स्नेह इतनी शक्ति मिलती कहाँ से है? यहाँ आज कारेनिना में लेव तोलस्तोय की बिलकुल शुरुआती पंक्तियाँ याद आ रही है, "सभी सुखी परिवार एक जैसे हैं और हर दुखी परिवार अपने ढंग से दुखी है।"

उपन्यास में एक और दुनिया है जिस में मन वृंदावन हो उठता है। इस दुनिया में रघुवर प्रसाद के कमरे को खिड़की से प्रवेश होता है। इस खिड़की के नीचे तीन पगडंडियाँ आकर मिलती है, गोबर-लिपी पगडंडियाँ। यहाँ खेत, चट्टाने, तालाब, नदी, बरगद, इमली, आम, फूलों के पेड़, महुआ और आम को बौरों की सुगंध, कौए, बगुले, गिलहरी, कोयल की कूक, चिड़ियों की चहचहाहट है। नदी का पानी एकदम छिछला, स्वच्छ और ठंडा, इतना साफ़ कि पानी के नीचे छोटे-बड़े पानी के तराशे हुए तरह-तरह के गोल पत्थर दिखते हैं। उपन्यास में प्रकृति के रूप के भव्य दर्शन होते हैं। निर्मल वर्मा की डायरी धुंध से उठती धुन में एक प्रश्न है, एक जिज्ञासा है: "क्या मैं एक ही समय में 'सच्चा' और 'कलात्मक' दोनों हो सकता है?" (पृ. 17)

रघुवर प्रसाद और सोनसी तो समय-समय पर खिड़की से कूद कर उस ओर चले जाते थे। एक बार रघुवर के माता-पिता भी खिड़की के पार जाते हैं। वहाँ प्रकृति में "रघुवर की मां के मन में आया कि वह फूल एक चोटी में खोस लेती, पर नहीं खोंसी। पिता के मन में आया कि रघुवर की माँ की चोटी में वे फूल खोंस देते पर नहीं खोसे।"(पृ. 76)एक वृद्ध दंपति में भी प्रकृति जिजीविषा पैदा करती है। यहाँ प्रकृति और जीवन एकाकार हो जाते हैं। व्यक्ति महकते फूलों का जैसे एक पेड़ बन जाता है।

खिड़की के उस पार चाय वाली बूढ़ी अम्मा, चिड़िया, विच्छू तक सिर्फ प्राणी है; अपना-अपना जीवन जीते, एक दूसरे को समझते, स्वीकारते। "तभी उड़ते हुए पक्षी ने बीट किया जो चट्टान के ऊपर पड़ा। बूढ़ी अम्मा ने गुस्से से उड़ते हुए पक्षियों को देखा। जितने पक्षी बूढ़ी अम्मा को दिखे थे, सब को मालूम हो गया था कि गलती हुई है और बूढ़ी अम्मा गुस्सा है। चट्टान के पास ही एक पत्थर गड्‌ढे में साफ पानी भरा था। बूढ़ी अम्मा ने वहीं से उलीच कर चट्टान पर पानी डाला और पक्षी के बीट को साफ किया। पक्षियों ने फिर कभी उस चट्टान पर बीट नहीं किया।" (पृ. 96)

रघुवर प्रसाद और सोनसी को जीवन के मधुर क्षण खिड़की से कूद कर मिलते हैं। वे कभी-कभी चुपचाप रात में भी खिड़की के उस पार चले जाते हैं। तालाब के किनारे बैठे वे 'मनुष्य जाति का आदिम जोड़ा' लगते थे। तालाब किनारे की काली चट्टानों पर सोनसी की पायल और कड़ों की रगड़ के निशान चट्टानों को भी तरल कर देने वाले हैं। प्रकृति, पक्षी और मनुष्य का एकालाप खिड़की के उस पार है। उस पार नहीं हैं तो इस भौतिक जगत की वस्तुएँ। उस पार नहीं है प्रतिस्पर्द्धा, घृणा, ईर्ष्या। हमारे समकालीन समाज का भटकाव इस खिड़की के बंद हो जाने का ही भटकाव तो नहीं?

यह उपन्यास पाठक की 'बिम्ब ग्रहण' और 'अर्थग्रहण' क्षमताओं का इम्तिहान-सा लेता दिखता है। हाथी और साधू का प्रसंग पूरे उपन्यास को बाँधने वाला एक धागा है, जिसे अंत में रघुवर प्रसाद खोल देते हैं। "कमरे के अंदर कोने में हाथी की मोटी लंबी ज़ंजीर पड़ी थी।"

कुछ दिनों के लिए सोनसी भी गाँव चली गई थी। रघुवर प्रसाद का खिड़की से कूद कर जाने का मन नहीं होता। रघुवर प्रसाद अकेले कुछ नहीं। सोनसी अकेली कुछ नहीं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'रसदशा' को 'भावदशा' और 'ज्ञानदशा' का मेल बताया है। दीवार में एक खिड़की रहती थी उपन्यास सामान्य मनुष्य को संबोधित इसी 'रसदशा' का एक आख्यान है।





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